अमेरिका में भारतीय IT प्रोफेशनल्स के भविष्य पर मंडराया संकट! समझें ट्रंप के एक्शन से क्या पड़ेगा असर?
Punjab News Live -PNL
October 9, 2026
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न्यूज डेस्क, (PNL) : अमेरिका में काम करने वाले भारतीय IT कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड पाने का रास्ता मुश्किल हो गया है. अमेरिकी सरकार ने इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, HCLTech, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी को ग्रीन कार्ड से जुड़ी PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से सस्पेंड कर दिया है. इनमें से 4 भारतीय कंपनियां हैं. सरकार ने इन कंपनियों पर वीजा और नौकरी से जुड़े नियमों के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाए हैं. इस फैसले से इन कंपनियों में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों की स्थायी रूप से अमेरिका में रहने की योजना अटक सकती है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इन कंपनियों को 2009 से अब तक एक लाख से ज्यादा लेबर सर्टिफिकेशन मिल चुके हैं.
1. PERM प्रक्रिया क्या है?
PERM यानी प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट अमेरिका में रोजगार के आधार पर ग्रीन कार्ड पाने की अहम प्रक्रिया है. इसे किसी विदेशी कर्मचारी को हमेशा के लिए नौकरी पर रखने यानी ग्रीन कार्ड से पहले अमेरिका के श्रम विभाग से लेना पड़ता है. इसमें कंपनी को श्रम विभाग के सामने साबित करना होता है कि संबंधित नौकरी के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं. साथ ही, विदेशी कर्मचारी को नौकरी देने से अमेरिकी कर्मचारियों की सैलरी और काम करने की स्थितियों पर बुरा असर नहीं पड़ रहा है.
इसके बाद कंपनी ग्रीन कार्ड की अगली प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है. अमेरिकी श्रम विभाग ने कहा कि वह इन 8 कंपनियों से जुड़े PERM के नए आवेदन स्वीकार नहीं करेगा और पहले से पेंडिंग आवेदनों पर भी कार्रवाई नहीं करेगा.
2. अमेरिका ने कंपनियों पर कार्रवाई क्यों की?
अमेरिकी सरकार का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के लिए नियमों का गलत इस्तेमाल किया. सरकार का कहना है कि इससे अमेरिकी लोगों की नौकरियों और सैलरी पर असर पड़ा है. अधिकारियों के मुताबिक, इन कंपनियों ने 2009 से अब तक करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए और उन्हें 2.30 लाख से ज्यादा H-1B वीजा मंजूर हुए. इन कंपनियों को एक लाख से ज्यादा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन भी मिले हैं.
3. कर्मचारियों और परिवारों पर क्या असर होगा?
H-1B वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों को लंबे समय तक अस्थायी वीजा पर रहना पड़ सकता है. PERM प्रक्रिया रुकने से उनका मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होता. हालांकि, जिन कर्मचारियों को वीजा बढ़वाना है, उनके लिए स्थिति मुश्किल हो सकती है. ऐसे लोगों को या तो अपनी कंपनी बदलनी होगी या H-1B वीजा की 6 साल की अवधि खत्म होने पर अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है.
नौकरी बदलने पर नई कंपनी के साथ ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ सकती है. वैसे भी ग्रीन कार्ड के लिए भारतीयों को 12 से 15 साल का इंतजार करना पड़ता है. नई रोक की वजह से भारतीय कर्मचारी ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन ही नहीं कर पाएंगे, जिससे उनका इंतजार और लंबा हो जाएगा. अभी अमेरिकी सरकार ने साफ नहीं किया है कि यह रोक कब तक बनी रहेगी.
करीब 10 लाख भारतीय ग्रीन कार्ड के इंतजार में
नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (NFAP) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में करीब 10 लाख भारतीय रोजगार के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं. दिसंबर 2025 तक रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के कुल पेंडिग मामलों में भारतीयों की हिस्सेदारी करीब 79% थी. रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन कार्ड देने के लिए देशों के आधार पर तय की गई सीमाओं का असर भारतीय नागरिकों पर चीन और फिलीपींस के नागरिकों की तुलना में कहीं ज्यादा पड़ रहा है.
NFAP की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर किसी स्किल्ड भारतीय पेशेवर ने जनवरी 2026 में नौकरी या लेबर सर्टिफिकेश के आधार पर अमेरिकी ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया शुरू की है, तो उसे अलग-अलग कैटेगरी में इतने साल इंतजार करना पड़ सकता है.
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EB-1 कैटेगरी: 4 से 5 साल
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EB-2 कैटेगरी: 179 साल
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EB-3 कैटेगरी: 38 साल
हालांकि ये 2026 के लिए NFAP के अनुमान हैं, किसी व्यक्ति के ग्रीन कार्ड मिलने की तय समय-सीमा नहीं. कानून, वीजा संख्या और बैकलॉग बदलने पर इंतजार भी बदल सकता है.
अमेरिकी सरकार का नया फैसला भारतीयों के लिए ज्यादा मुश्किल पैदा करेगा, क्योंकि अमेरिका में उनके ग्रीन कार्ड के लाखों आवेदन पहले से पेंडिग हैं. अमेरिकी विदेश विभाग के सितंबर 2026 के वीजा बुलेटिन में भारतीयों के लिए EB-2 कैटेगरी के तहत ग्रीन कार्ड जारी करने के लिए वीजा उपलब्ध नहीं था. हालांकि, अक्टूबर 2026 के नए बुलेटिन में स्थिति बदली है. अब इस कैटेगरी में उन भारतीय आवेदकों की बारी आ सकती है, जिनकी प्राथमिकता तारीख 1 नवंबर 2013 से पहले की है. वहीं, EB-3 कैटेगरी में उन्हीं आवेदकों की बारी आ रही थी, जिन्होंने 1 जनवरी 2014 से पहले आवेदन किया था. अमेरिका में हर देश के नागरिकों को हर साल रोजगार के आधार पर मिलने वाले ग्रीन कार्ड की संख्या सीमित है.
4. करियर और भविष्य की योजनाओं पर क्या असर पड़ेगा?
ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया अटकने से नौकरी बदलने, प्रमोशन लेने और करियर की लंबी योजना बनाने में परेशानी हो सकती है. घर खरीदने, बच्चों की पढ़ाई और बचत जैसे फैसले भी अनिश्चितता में पड़ सकते हैं. कंपनियों को भर्ती, विदेशी कर्मचारियों की तैनाती और नियमों के पालन पर ज्यादा ध्यान देना होगा. तीसरी कंपनियों के जरिए कर्मचारियों को नौकरी देने और दूसरे देशों से कर्मचारियों को अमेरिका भेजने वाले तरीकों की जांच भी बढ़ सकती है.
आगे प्रभावित कंपनियां कानूनी विकल्प तलाश सकती हैं और नियमों के मुताबिक अपनी प्रक्रियाओं में बदलाव कर सकती हैं. वहीं, कुछ भारतीय पेशेवर ऐसे दूसरे देशों में नौकरी ढूंढ सकते हैं, जहां स्थायी निवास का रास्ता साफ हो. वहीं कुछ लोग भारत लौटने को मजबूर हो सकते हैं.
5. H-1B वीजा, PERM और ग्रीन कार्ड में क्या अंतर है?
H-1B वीजा अमेरिका में तय समय तक काम करने की अनुमति देता है. वहीं, PERM अमेरिका में स्थायी रूप से रहने के लिए ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया का शुरुआती कदम है. इसके बाद ग्रीन कार्ड की बाकी प्रक्रिया पूरी होती है. अमेरिकी सरकार ने यह नहीं बताया है कि उसके फैसले से कितने भारतीय कर्मचारी प्रभावित होंगे. साथ ही 8 कंपनियों पर यह रोक कब तक रहेगी.
PERM सस्पेंशन पर TCS का बयान
TCS ने बयान जारी कर कहा कि उसने अमेरिकी सरकार के श्रम विभाग के सभी निर्देशों का पालन करेगी. TCS के मुताबिक, अमेरिका में उसकी रणनीति स्थानीय लोगों को नौकरी देने पर आधारित है. इसके लिए कंपनी कॉलेजों और यूनिवर्सिटी से भी भर्ती करती है. अमेरिका में उसके 31 ऑफिस और डिलीवरी सेंटर हैं, जहां बड़ी संख्या में स्थानीय कर्मचारी काम करते हैं. कंपनी अगले 5 साल में अमेरिका में 15,000 और लोगों को नौकरी देने की योजना बना रही है. TCS ने बताया कि पिछले दो साल में उसके PERM आवेदन सिंगल डिजिट ही रहे हैं. इसलिए कंपनी को लगता है कि इस रोक से कर्मचारियों की भर्ती की रणनीति और ग्राहकों के काम पर असर नहीं पड़ेगा.