सुखबीर बादल का रॉक स्टार अंदाज:पैंट-शर्ट, पिज्जा-कोक और युवाओं के साथ सेल्फी; विधानसभा चुनाव से पहले Gen-Z पर फोकस
Punjab News Live -PNL
October 9, 2026
जालंधर, ताजा खबर, पंजाब
जालंधर , (PNL) : 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल ने युवाओं से जुड़ने के लिए ‘वाइब पंजाब दी’ अभियान शुरू किया है। इस अभियान में पार्टी अध्यक्ष सुखबीर बादल का अंदाज रॉक स्टार जैसा नजर आ रहा है। वे युवाओं के बीच नए लुक और बदले हुए बातचीत के अंदाज में पहुंच रहे हैं।दो कॉलेजों में हुए कार्यक्रमों में युवाओं ने उनसे राजनीति के साथ निजी पसंद और परिवार से जुड़े सवाल पूछे। सुखबीर ने पिज्जा, पास्ता और कोक पसंद होने की बात बताई। उन्होंने युवाओं के साथ सेल्फी भी ली।
अकाली दल का यह अभियान 2027 से पहले Gen-Z और युवा वोटरों तक पहुंच बनाने की कोशिश का हिस्सा है।
7 अक्टूबर को मोगा के गुरु नानक कॉलेज में इस अंदाज में सुखबीर बादल नजर आए।
कॉलेज पहुंचे तो बदला अंदाज एक अक्टूबर को पटियाला के खालसा कॉलेज में हुए कार्यक्रम में सुखबीर बादल छात्रों के बीच पहुंचे। यहां मंच से लंबा राजनीतिक भाषण देने के बजाय उन्होंने युवाओं से सीधे बातचीत की। सवाल राजनीति से लेकर निजी पसंद तक पहुंचे। पिज्जा, पास्ता और डाइट कोक की पसंद बताई। परिवार की बातें कीं और छात्रों के साथ सेल्फी भी ली।
यानी माहौल रैली वाला कम और युवा कनेक्ट वाला ज्यादा था। मीडिया रिपोर्टों में उनके इस अंदाज को ‘कूल डैड’ इमेज से जोड़कर देखा गया।अकाली दल की पुरानी तस्वीर से कितना अलग? अकाली दल की राजनीति लंबे समय तक पंथक मुद्दों और अपने पारंपरिक वोट बैंक के आसपास घूमती रही है। सुखबीर बादल भी इसी राजनीतिक पहचान के प्रमुख चेहरों में रहे हैं, लेकिन अब पार्टी की नजर उस पीढ़ी पर है, जो सोशल मीडिया और कॉलेज कैंपस की राजनीति के दौर में बड़ी हुई है।
इसीलिए सुखबीर का नया अंदाज सिर्फ कपड़े बदलने तक सीमित नहीं है। बात करने की भाषा बदली है, मंच बदला है और टारगेट भी बदला है।
पहले 43 रैलियां, अब Gen-Z पर फोकस अकाली दल ने पहले अपने पारंपरिक आधार तक पहुंच बनाने के लिए 43 रैलियां कीं। अब पार्टी Gen-Z को जोड़ने पर जोर दे रही है। ‘वाइब पंजाब दी’ इसी रणनीति का हिस्सा है। 7 अक्टूबर को मोगा के कार्यक्रम में भी सुखबीर बादल युवाओं के बीच इसी बदले अंदाज में पहुंचे। वहां उन्होंने मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े वादे किए।
पढ़िए सुखबीर बादल ऐसा क्यों कर रहे…
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पंथक वोट बैंक से दूरी: बेअदबी और नशे के मुद्दों ने अकाली दल के पारंपरिक पंथक आधार को नुकसान पहुंचाया। 2015 की बेअदबी की घटनाओं और उसके बाद हुए पुलिस फायरिंग के मामलों को लेकर अकाली नेतृत्व लगातार विपक्ष के निशाने पर रहा। नशे का मुद्दा भी पार्टी के खिलाफ बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना।
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10 साल में बदला चुनावी प्रदर्शन: 2012 में SAD ने 56 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2017 में यह आंकड़ा घटकर 15 रह गया और 2022 में पार्टी सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई। यानी एक दशक में विधानसभा में पार्टी की ताकत 56 से 3 सीटों तक आ गई।
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पंथक वोट में बिखराव: अब पंथक राजनीति में अकाली दल के सामने दूसरे समूह और नए राजनीतिक दावेदार भी हैं। इससे पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखना चुनौती बन गया है।
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युवा वोटर पर नजर: ऐसे में 2027 से पहले पार्टी का फोकस सिर्फ पुराने वोट बैंक पर नहीं है। ‘वाइब पंजाब दी’ के जरिए कॉलेजों और Gen-Z तक पहुंच बनाई जा रही है। सुखबीर का बदला अंदाज इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पुराना पंथक आधार कमजोर हुआ तो अब नई पीढ़ी से कनेक्ट बनाने की कोशिश है।
सुखबीर बादल की पर्सनल छवि क्यों कमजोर हुई…
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2015 की बेअदबी और बहिबल कलां-कॉट्कापुरा फायरिंग: उस समय सुखबीर डिप्टी CM और गृह मंत्री थे। इन घटनाओं को लेकर उन पर राजनीतिक और पंथक जवाबदेही का सवाल लगातार उठता रहा।
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डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख को माफी का विवाद: 2007 के विवाद में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को माफी दिए जाने के फैसले ने अकाली नेतृत्व की पंथक साख को नुकसान पहुंचाया और बाद में यह फैसला वापस लेना पड़ा।
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अकाल तख्त की कार्रवाई: 2024 में अकाल तख्त ने 2007-17 के अकाली शासन में हुई गलतियों के लिए सुखबीर को धार्मिक दंड दिया। इससे व्यक्तिगत स्तर पर भी विवाद उनके साथ जुड़ गया।
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पार्टी की लगातार चुनावी गिरावट: 2012 में सत्ता, फिर 2017 में 15 और 2022 में सिर्फ 3 सीटें। इससे नेतृत्व और रणनीति पर सवाल बढ़े।
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पार्टी के भीतर नेतृत्व पर सवाल: 2024 में बागी अकाली नेताओं ने खुले तौर पर कहा था कि पहले लोग बादल के नाम पर वोट देते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह पार्टी के अंदर की धारणा को भी दिखाता है।