जालंधर , (PNL) : न्यूजीलैंड की ऑकलैंड डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने 7.55 करोड़ रुपए (8 लाख डॉलर) की ठगी मामले में फंसे 3 पंजाबी युवकों में से एक मास्टरमाइंड को 7 मई को 4 साल की जेल की सजा सुनाई। इनके 2 साथियों को 4 मई को 2 साल से अधिक की कैद की सजा मिली थी।तीनों ने खुद को बैंक अधिकारी बताकर 28 बुजुर्गों के कैश कार्ड और पिन नंबर हासिल किए। इसके बाद पुलिस ने सीसीटीवी और कॉल रिकॉर्ड्स के जरिए इन्हें गिरफ्तार कर लिया था। 2024 से कोर्ट में इनका ट्रायल चल रहा था। अब ये तीनों अपनी जेल की सजा पूरी करने के बाद भारत डिपोर्ट किए जाएंगे।
8 लाख डॉलर की ठगी करने वाले इन तीनों पंजाबी युवकों की पहचान परगट भंगू (24), गुरविंदर सिंह (22) और हरमनदीप सिंह (23) रूप में हुई है। सभी पंजाब से आकर यहां वर्क और स्टूडेंट वीजा पर रह रहे थे। मुख्य आरोपी परगट को मास्टरमाइंड मानते हुए 7 मई 2026 को 4 साल की जेल सुनाई गई, जबकि गुरविंदर सिंह और हरमनदीप सिंह को बुजुर्गों के घर से कार्ड इकट्ठा करने और ठगी के पैसों से खरीदारी करने के जुर्म में 4 मई को सजा दी गई।
पुलिस के अनुसार, कम उम्र में अमीर बनने के लालच में इन युवकों ने संगठित अपराध का रास्ता चुना और अब जेल की सजा पूरी करने के बाद इन्हें वापस भारत डिपोर्ट कर दिया जाएगा।
जानें किस तरीके से बुजुर्गों को ठगा गया…
डाटा जुटाकर बुजुर्गों को बनाते थे निशाना: आरोपी युवक फोन डायरेक्टरी से नंबर ढूंढते थे। वे लैंडलाइन नंबरों पर ही फोन करते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि बुजुर्ग लोग आज भी लैंडलाइन का उपयोग करते हैं। वे उन इलाकों को चुनते थे जहां रिटायर्ड लोग ज्यादा रहते थे। फोन करने से पहले वे अकसर बुजुर्ग का नाम और पता पहले से जानते थे, जिससे उनकी बातों पर यकीन करना आसान हो जाता था।
कभी बैंककर्मी तो कभी पुलिस वाले बनकर करते फोन: तीनों युवक ठगी के दौरान डबल कॉलिंग तकनीक का उपयोग करते थे। पहले एक युवक बैंक अधिकारी बनकर फोन करता था। जब बुजुर्ग को थोड़ा शक होता, तो वह कहता कि आप अभी पुलिस को फोन करके पुष्टि कर लें। वे फोन काटते नहीं थे और लाइन होल्ड पर रखते थे। बुजुर्ग जब पुलिस का नंबर डायल करता, तो दूसरा साथी ही पुलिस बनकर फोन उठाता और बैंक की बात को सही बताता। इससे बुजुर्ग पूरी तरह उनके जाल में फंस जाते थे।
बातों में फंसाकर पिन नंबर निकलवा लेते थे: युवक बुजुर्गों को सीधे पिन नंबर बताने के लिए नहीं कहते थे ताकि शक न हो। वे कहते थे कि आप अपना पिन नंबर अपने फोन के कीपैड पर टाइप करें। तकनीक के जरिए वे कीपैड की आवाज (Tone) को रिकॉर्ड कर लेते थे या फिर उन्हें बातों में उलझाकर पिन कोड को बैंक के ‘वेरिफिकेशन कोड’ के रूप में मांग लेते थे। वे बुजुर्गों को यकीन दिलाते थे कि पुराना कार्ड ‘कैंसिल’ करना जरूरी है।
कूरियर बॉय बन कलेक्ट करते थे कार्ड: जब कार्ड लिफाफे में बाहर रख दिया जाता था, तो इनका तीसरा साथी डिलीवरी एजेंट या कूरियर बॉय की वर्दी पहनकर वहां पहुंचता था। पुलिस के अनुसार ये युवक इतने शातिर थे कि वे खुद को बैंक का सुरक्षाकर्मी बताकर बुजुर्ग के घर के अंदर तक चले जाते थे। वे बुजुर्गों को एक जाली रसीद भी देते थे ताकि उन्हें लगे कि उनका कार्ड सुरक्षित हाथों में गया है।
खरीदारी करते या एटीएम से पैसा निकाल लेते: जैसे ही कार्ड इनके हाथ लगता तो ये बिना समय गंवाए पास के एटीएम से कैश निकालते थे। इसके बाद वे एप्पल के स्टोर या ज्वेलरी की दुकानों पर जाकर महंगे आईफोन और गहने खरीदते थे। वे ऐसा इसलिए करते थे ताकि अगर बैंक कार्ड ब्लॉक भी कर दे, तो भी उनके पास कीमती सामान रहे जिसे बाद में कैश में बदला जा सके। पुलिस ने इनके पास से ऐसे कई ब्रांडेड सामान बरामद किए हैं।
कैसे पकड़े गए युवक…
चोरी के कार्ड्स शॉपिंग मॉल में यूज करने पर पकड़े गए: इन युवकों की सबसे बड़ी गलती चोरी किए गए कार्ड्स का इस्तेमाल बड़े शॉपिंग मॉल में करना रही। पुलिस ने मॉल के हाई क्वालिटी वाले सीसीटीवी कैमरों की मदद से इनके चेहरों की पहचान की। इसके बाद मोबाइल टावर लोकेशन और बैंक ट्रांजेक्शन के समय का मिलान करके पुलिस इन तक पहुंच गई।
पुलिस ने स्टिंग कर जाल बिछाया: न्यूजीलैंड पुलिस ने इन शातिर ठगों को पकड़ने के लिए एक बड़ा जाल बिछाया था। इसकी शुरुआत अक्टूबर और नवंबर 2024 के दौरान हुई। पुलिस ने स्टिंग ऑपरेशन किया। इसमें एक बुजुर्ग महिला को फोन आने पर सादे कपड़ों में पुलिस टीम तैनात कर दी गई और महिला से लिफाफे में असली कार्ड के बजाय खाली कागज रखवाया गया। जैसे ही एक युवक वह लिफाफा उठाने पहुंचा तो पुलिस ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया, जिसकी निशानदेही पर बाद में अल्बानी और ग्लेनफील्ड के ठिकानों पर छापेमारी करके बाकी दो साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया।