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झूठी रिश्वत शिकायत करने वाले को हाईकोर्ट से झटका:डॉक्टर के खिलाफ नहीं साबित हुए आरोप, शिकायतकर्ता पर चलती रहेगी कानूनी कार्रवाई

चंडीगढ़ , (PNL) : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक फैसले में झूठी रिश्वत शिकायत करने के आरोपी व्यक्ति को आज राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की शिकायत के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज होता है और बाद में शिकायत झूठी साबित हो जाती है, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने गुरदेव सिंह की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा। इसके साथ ही उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत चल रही कार्रवाई जारी रखने का रास्ता साफ हो गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के आदेश सही हैं और उनमें कोई कानूनी गलती नहीं है। इसी कारण अदालत ने गुरदेव सिंह की याचिका खारिज कर दी। अब उसके खिलाफ झूठी शिकायत देने के मामले में कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।

अब 4 पॉइंट्स में पढ़ें क्या है पूरा मामला:-

  • डॉक्टर पर लगाया था रिश्वत मांगने का आरोप: गुरदेव सिंह ने 8 सितंबर 2006 को विजिलेंस ब्यूरो, मानसा में शिकायत दी थी कि सिविल अस्पताल सरदूलगढ़ में तैनात डॉक्टर आरपी सिंगल ने उसकी मां को अस्पताल में भर्ती करने के लिए 2 हजार रुपए रिश्वत मांगी है। शिकायत के आधार पर विजिलेंस ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज कर डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी।

  • अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ गया : हालांकि ट्रायल के दौरान गुरदेव सिंह अपने ही आरोपों से पीछे हट गया। अदालत में गवाही देते हुए उसने कहा कि डॉक्टर ने उससे कोई रिश्वत नहीं मांगी थी। शिकायतकर्ता के बयान बदलने के बाद अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ गया और अदालत ने 1 अप्रैल 2009 को डॉक्टर को बरी कर दिया।

  • बरी होते ही शिकायतकर्ता पर कार्रवाई: डॉक्टर के बरी होने के बाद विजिलेंस विभाग ने शिकायत को झूठा मानते हुए गुरदेव सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत कार्रवाई शुरू कर दी। ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ आरोप तय किए थे, जबकि पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी गई थी। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

  • अधिकारी ने मूल शिकायत दर्ज नहीं की थी: याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कार्रवाई करने वाले अधिकारी ने मूल शिकायत दर्ज नहीं की थी, इसलिए यह कानूनी रूप से वैध नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि कार्रवाई निर्धारित समय सीमा के बाद शुरू की गई थी।

हाईकोर्ट ने दोनों दलीलें ठुकराईं

हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत झूठी होने का तथ्य डॉक्टर के बरी होने के बाद 1 अप्रैल 2009 को सामने आया था। इसके बाद 3 नवंबर 2009 को कलंदरा दायर किया गया, जो कानून में निर्धारित एक वर्ष की अवधि के भीतर था। इसलिए कार्रवाई समय-सीमा से बाहर नहीं मानी जा सकती।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस विभाग के डीएसपी स्तर के अधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज हुई थी, उसी विभाग के समान रैंक के दूसरे अधिकारी द्वारा कलंदरा दायर किया जाना पूरी तरह वैध है। ऐसे मामलों में अधिकारी का नाम नहीं, बल्कि उसका पद और विभाग महत्वपूर्ण होता है।

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