न्यूज डेस्क, (PNL) : सुप्रीम कोर्ट ने आज बुधवार को अपने अहम फैसले में कहा कि चुनाव आयोग के पास SIR कराने का पूरा अधिकार है. कोर्ट में बिहार में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रकिया को चुनौती दी गई थी जिसे खारिज करते हुए कोर्ट ने SIR कराने की आयोग की शक्तियों को बरकरार रखा है. इन याचिकाओं में यह दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत आयोग के पास इतने बड़े स्तर पर SIR कराने की शक्तियां नहीं हैं. देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग ने बिहार में SIR कराकर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का कोई उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि इस तरह के अभ्यास से वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित हुई और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव में सहायता मिली.कोर्ट ने कहा, “हम इस बात से भी पूरी तरह संतुष्ट हैं कि एसआईआर द्वारा प्राप्त किया जाने वाला उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य से सीधा जुड़ा हुआ है. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते. वे मूल रूप से वोटर लिस्ट की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव हैं.”
अपने फैसले में कोर्ट ने आगे कहा, “आयोग द्वारा दर्ज किए गए कारण, यानी अंतिम गहन संशोधन के बाद से चार दशकों से अधिक का समय बीत जाना, कई सालों से बड़े पैमाने पर नामों का जुड़ना और हटना, तीव्र शहरीकरण, प्रवासन और इसके परिणामस्वरूप वोटर लिस्ट में पुनरावृत्ति और अशुद्धियों की संभावना, स्पष्ट रूप से उस मूलभूत सत्यनिष्ठा को बनाए रखने की दिशा में निर्देशित हैं.”
12 अगस्त को शुरू हुई थी अंतिम बहस
इससे पहले चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली एक बेंच ने 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. इनमें चर्चित NGO ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) द्वारा दायर याचिका भी शामिल थी. बिहार में SIR की प्रक्रिया का पहला चरण पूरा किया जा चुका है.
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले पर अंतिम बहस शुरू की थी. तब कोर्ट ने यह कहा था कि कि वोटर लिस्ट में नामों को शामिल करना या उन्हें हटाना, चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के तहत आता है. चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के बाद उन 65 लाख लोगों के नामों की लिस्ट जारी की थी, जिन्हें बाद में प्रकाशित की गई वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट से हटा दिया गया था.
एसआईआर की अधिसूचना के अनुसार, जो वोटर्स 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में मौजूद नहीं थे, उन्हें उस समय की लिस्ट में मौजूद किसी व्यक्ति के साथ अपना ‘पुश्तैनी संबंध’ साबित करना था. तब चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया का बचाव करते हुए यह तर्क दिया था कि आधार कार्ड और वोटर ID कार्ड को नागरिकता को लेकर ‘पुख्ता सबूत’ नहीं माना जा सकता.
प्रक्रिया की समयसीमा पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल याचिकाओं में यह भी आरोप लगाया गया कि वोटर लिस्ट का यह संशोधन एक “NRC जैसी प्रक्रिया” है, जिसके तहत चुनाव आयोग नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि यह अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास ही है.
ADR की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए तय की गई समयसीमा पर सवाल उठाए थे. इसके अलावा, उन्होंने उन 65 लाख वोटर्स से जुड़े आंकड़ों पर भी सवाल खड़े किए थे, जिन्हें या तो ‘मृत’ घोषित कर दिया गया, या फिर उन्हें ‘प्रवासी’ मान लिया गया था, या फिर उन्हें किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र में रजिस्टर्ड दिखाया गया था.