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पंजाब विजिलेंस का बड़ा एक्शन : पॉवरकॉम विभाग के पूर्व CMD, XEN और बिल्डर को किया गिरफ्तार, इतने करोड़ रुपए की ठगी का आरोप, पढ़ें

लुधियाना, (PNL) : लुधियाना में विजिलेंस ब्यूरो ने करोड़ों रुपए के कथित घोटाले में पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) के पूर्व CMD केडी चौधरी को गिरफ्तार किया, वह अकाली नेताओं के करीबी रहे। उनके साथ रिटायर्ड XEN संजीव प्रभाकर और लुधियाना के बिल्डर अमित गर्ग को भी पकड़ा गया है।  विजिलेंस जांच में सामने आया कि तीनों ने कथित तौर पर मिलीभगत कर सरकारी नियमों की अनदेखी करते हुए निजी हाउसिंग कॉलोनी ‘बसंत सिटी’ में 10 करोड़ रुपए सरकारी फंड खर्च कर 66 केवी का सब-स्टेशन लगवाया।

जांच के अनुसार, नियमों के तहत इस सब-स्टेशन को लगाने का पूरा खर्च बिल्डर को खुद उठाना था, लेकिन आरोप है कि तत्कालीन SDO संजीव प्रभाकर और उस समय के PSPCL CMD केडी चौधरी ने विभागीय फंड का इस्तेमाल कर यह काम करवाया। विजिलेंस की जांच में PSPCL अधिकारियों और बिल्डर के बीच मिलीभगत भी सामने आई है।

पूर्व चीफ इंजीनियर पावरकॉम संजीव प्रभाकर (फाइल फोटो)

पूर्व चीफ इंजीनियर पावरकॉम संजीव प्रभाकर (फाइल फोटो)

अधिकारियों की मिलीभगत से सब-स्टेशन लगवाया

पंजाब विजिलेंस ब्यूरो के प्रवक्ता के अनुसार, मामला 66 केवी बसंत एवेन्यू सब-स्टेशन की स्थापना से जुड़ा है। आरोप है कि बसंत एवेन्यू के कॉलोनाइजर ने PSPCL के फील्ड अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अपनी कॉलोनी में 1015 वर्ग गज जमीन पर यह सब-स्टेशन लगवाया।

जांच में सामने आया कि यदि उस समय उच्च अधिकारियों द्वारा कॉलोनाइजर की सभी कॉलोनियों के NOC और बिजली लोड की संयुक्त जांच करवाई जाती, तो 66 केवी सब-स्टेशन का पूरा खर्च कॉलोनाइजर को खुद उठाना पड़ता।

बिजली विभाग के आदेशों का पालन नहीं किया

विजिलेंस के मुताबिक, सब-स्टेशन की स्थापना में बिजली विभाग के आदेशों का पालन नहीं किया गया। यह तथ्य भी छिपाया गया कि बसंत एवेन्यू सब-स्टेशन तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं थी और यह पक्खोवाल लिंक रोड से करीब 3 किलोमीटर दूर खेतों के बीच स्थित है।

इसके बावजूद विभाग के उच्च अधिकारियों और तत्कालीन CMD ने इन कमियों को नजरअंदाज करते हुए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। विजिलेंस का कहना है कि तत्कालीन XEN संजीव प्रभाकर और अन्य फील्ड अधिकारियों द्वारा भेजे गए प्रस्ताव में मौजूद खामियों को भी अनदेखा किया गया, जिससे बसंत एवेन्यू कॉलोनी को सीधा लाभ पहुंचा।

वर्तमान में भी यह 66 केवी सब-स्टेशन अविकसित कॉलोनियों और खेतों के बीच स्थित है और वहां तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। विजिलेंस ब्यूरो ने बताया कि मामले की जांच जारी है और गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ की जा रही है।

पूर्व CMD केडी चौधरी को अकाली नेताओं का करीबी माना जाता था, उन्होंने पद से हटाने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार को नियमों में बदलाव करना पड़ा था।

केडी चौधरी को पद से हटाने नियम बदलने पड़े थे

जानकारी के अनुसार, सारल 2017 में तत्कालीन कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PSPCL) के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) पद से जुड़े नियमों में बदलाव किया था। उस समय केडी चौधरी इस पद पर तैनात थे और उन्हें पूर्व अकाली सरकार के करीबी अधिकारियों में माना जाता था।

28 मार्च 2017 को पंजाब मंत्रिमंडल की बैठक में फैसला लिया गया कि PSPCL के CMD पद के लिए पात्रता नियमों में संशोधन किया जाए। इसके तहत यह पद, जो पहले मुख्य रूप से टेक्नोक्रेट्स तक सीमित था, प्रधान सचिव या उससे ऊपर रैंक के IAS अधिकारियों के लिए भी खोल दिया गया। शर्त यह रखी गई कि संबंधित अधिकारी को बिजली क्षेत्र में कार्य का अनुभव होना चाहिए।

उस समय सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि पहले के नियमों में “बोर्ड निदेशक” के रूप में एक साल के अनुभव की शर्त थी, जिसे केडी चौधरी की नियुक्ति के अनुरूप माना जाता था। बाद में यह शर्त हटा दी गई और सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन, इंस्ट्रूमेंटेशन तथा सूचना प्रौद्योगिकी जैसी शाखाओं को भी पात्रता में शामिल कर लिया गया। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के अनुभव को भी मान्यता दी गई।

उस दौरान पीएसईबी इंजीनियर्स एसोसिएशन ने शुरुआत में इस बदलाव का विरोध किया था, लेकिन बाद में पात्रता दायरा बढ़ाने और बोर्ड निदेशक के अनुभव की अनिवार्यता हटाने पर सहमति जताई थी। एसोसिएशन के तत्कालीन पदाधिकारियों ने आरोप लगाया था कि निगम में कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है और कुछ अधिकारियों को विशेष लाभ दिया जा रहा है।

तत्कालीन बिजली विभाग के प्रधान सचिव ए. वेणु प्रसाद ने उस समय कहा था कि पंजाब बिजली उत्पादन आधारित मॉडल से आगे बढ़कर बिजली प्रबंधन की दिशा में काम कर रहा है, इसलिए CMD पद के लिए पात्रता मानदंडों को व्यापक बनाया गया। हालांकि, उस समय राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस फैसले को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी हुई थीं।

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