मिसाइलों के बाद अब ईरान की अर्थव्यवस्था पर हमला, ट्रंप की रणनीति कितनी कारगर?
Punjab News Live -PNL
August 11, 2026
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न्यूज डेस्क, (PNL) : अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रही जंग अब एक नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है. अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 9 अगस्त को कहा कि अमेरिका फिलहाल नई बड़ी सैन्य कार्रवाई के बजाय ईरान पर बढ़ते आर्थिक दबाव को काम करने देगा. यानी मिसाइल और बमों के बाद अब तेल, जहाज, बैंकिंग नेटवर्क और प्रतिबंध अमेरिका के बड़े हथियार होंगे. अमेरिका की कोशिश है कि ईरान की कमाई घटे, उसके लिए हथियार खरीदना और सेना को चलाना मुश्किल हो और आखिरकार तेहरान बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर हो. लेकिन सवाल है कि क्या आर्थिक दबाव उतना असरदार होगा, जितना ट्रंप उम्मीद कर रहे हैं.
ईरान के खिलाफ लंबे सैन्य अभियान के बावजूद युद्ध खत्म नहीं हुआ. लगातार सैन्य कार्रवाई में हथियारों और संसाधनों की खपत भी बढ़ रही है. ऐसे में आर्थिक दबाव अमेरिका को बिना बड़े नए हमलों के ईरान पर दबाव बनाए रखने का रास्ता देता है. ट्रंप प्रशासन खास तौर पर ईरान के तेल कारोबार को निशाना बनाकर उसकी कमाई रोकना चाहता है.
ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए तेल बेहद अहम है. अमेरिकी रणनीति का एक बड़ा हिस्सा ईरानी तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचने से रोकना है. यहां सबसे बड़ी चुनौती चीन है. अमेरिकी-चीनी आर्थिक और सुरक्षा आयोग के मुताबिक चीन ईरान के करीब 90% निर्यातित तेल का खरीदार है. चीन की छोटी टीपॉट रिफाइनरियां ईरानी तेल की प्रमुख खरीदार हैं.
ईरान ने भी प्रतिबंधों से बचने के रास्ते बनाए हैं. वह शैडो फ्लीट यानी ऐसे टैंकरों का इस्तेमाल करता है, जिनसे तेल की असली उत्पत्ति और खरीदार की पहचान छिपाने की कोशिश होती है. इसके अलावा वैकल्पिक भुगतान और वित्तीय नेटवर्क भी काम करते हैं. मार्च 2026 में युद्ध के दौरान भी एक ट्रैकर के मुताबिक ईरान ने करीब 11.36 लाख बैरल प्रतिदिन तेल निर्यात किया, जिसकी अनुमानित कीमत 3.63 अरब डॉलर थी.
अमेरिका की रणनीति सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है. वह ईरान से जुड़े बैंकिंग, विदेशी मुद्रा और समुद्री नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ा रहा है. मकसद है तेल बेचना मुश्किल करना, उसे ढोना मुश्किल करना और उससे मिले पैसे को अंतरराष्ट्रीय कारोबार में इस्तेमाल करना मुश्किल करना.
इस पूरी लड़ाई में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे अहम है. 11 अगस्त को अमेरिका-ईरान बातचीत में गतिरोध के बीच ब्रेंट क्रूड 88 डॉलर प्रति बैरल और WTI 82.45 डॉलर तक पहुंच गया. ट्रंप की ईरान से युद्ध के नुकसान की भरपाई की मांग ने होर्मुज खोलने पर बातचीत को और मुश्किल बनाया है.
यही ट्रंप की रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है. प्रतिबंध ईरान की कमाई घटा सकते हैं, लेकिन उनका असर तुरंत नहीं दिखता. ईरान के पास चीन जैसे बड़े खरीदार और प्रतिबंधों से बचने के पुराने रास्ते हैं. इसलिए जब तक चीन ईरानी तेल खरीदता रहेगा, अमेरिका के लिए ईरान की तेल कमाई पूरी तरह रोकना मुश्किल होगा.
आर्थिक दबाव का फायदा अमेरिका को यह है कि इसमें अमेरिकी सैनिकों का सीधा जोखिम कम रहता है. लेकिन इसका नुकसान यह है कि होर्मुज संकट से वैश्विक तेल कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर अमेरिका के साथ उसके सहयोगी देशों और भारत जैसे बड़े तेल आयातकों पर भी पड़ेगा.
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है. होर्मुज में लंबे समय तक तनाव रहने से तेल और शिपिंग महंगी हो सकती है. इससे भारत का आयात बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. यानी ट्रंप का नया दांव सिर्फ ईरान को कमजोर करने की कोशिश नहीं है. इसका असर चीन, वैश्विक तेल बाजार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंच सकता है.अमेरिका अब ईरान को युद्ध के मैदान में नहीं, उसकी कमाई के रास्ते पर दबाव डालकर झुकाना चाहता है. लेकिन चीन की तेल खरीद और ईरान के वैकल्पिक नेटवर्क के कारण यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह अभी तय नहीं है.